द्वारा मीना शर्मा (1854, ऐटीएस विलेज, 8076456439)
समाज के प्रति हमारे क्या दायित्व हैं, यह समझना एक स्वस्थ समाज के लिए बहुत जरूरी है। समाज संगठित और प्रगतिशील तभी बनता है जब उसमें सभी की भागीदारी होय सबका सहयोग हो। कुछ लोग सम्पन्न हैं, वही कितने लोग ऐसे भी हैं जो सिर्फ भूख के लिए ही लड़ाई लड़ रहें हैं, वह इतने सक्षम नहीं की अपनें बच्चों को पढ़ा सकें। उन बच्चों का कोई भविष्य ही नहीं है। क्या करेंगे वो? इसी भावना को लेकर समाजसेवी संस्थाएं आगे आईं हैं। ये बच्चे भी शिक्षित होंगे तो समाज भी बेहतर होगा, इनका भविष्य भी बेहतर होगा।
इसी संदर्भ में, हमारी मुलाकात ऐटीएस विलेज निवासी अलका तिवारी (१७७१) से हुई। वो ‘‘आश्रय“ नामक समाजसेवी संस्था से जुड़ीं हैं। २००३ में संस्थापित यह यह संस्था झुग्गी झोंपड़ी में रहने वाले मजदूर परिवार के बच्चों को पढ़ाना और उनकी अन्य जरूरतें भी पूरी करती है। २0१६ में अलका जी नें २५ बच्चों के साथ एक घर किराए पर लेकर दो शिफ्टों में पढ़ाना और बच्चों को आश्रय देने का काम शुरू किया। धीरे-धीरे बच्चे बढ़ते गए और करोना से पहले १२५ बच्चे इस संस्था से जुड़े और पढ़े।
अलका तिवारी एक कर्मठ और लगनशील महिला हैं, साथ ही बच्चों के प्रति संवेदनशील हैं। वो दो शिफ्ट में स्कूल चलातीं थीं, सभी बच्चों के लिए घर से खाना भी लेकर जातीं थीं। सुबह की शिफट में नए बच्चे आते थे जिन्हें पढ़ाई के माहौल में ढाला जाता। और दूसरे शिफ्ट में बच्चे स्कूल से सीधे यहीं आते, पढ़ाई करतें और ५ बजे उनकी छुट्टी हो जाती।
करोना के बाद फिर कामगार वापस लौट रहे हैं और पुनरू बच्चे जुड़ते जा रहें हैं। अभी 50 बच्चे हैं जिनका दायित्व वह उठा रहीं हैं। बच्चों की पूरी तैयारी करवा कर उन्हें अच्छे स्कूलों में परीक्षा दिलवा कर भर्ती भी करवाया जाता है ताकि वो मुख्य धारा से जुड़ जाएं और उन्हें भी एक राह मिले। ये बच्चे क्च्ै ैबीववसए ैंदवितज ैबीववस ;ळण्छण्द्ध, पंचशील जैसे स्कूलों में पढ़ रहें हैं।
।उपजल ैबीववस के छात्रा भी इन्हें पढ़ानें आतें हैं। अनेक लोग इन्हें सहायता भी करतें हैं, क्योकि इस बड़े काम में बिना सहयोग के आगे बढ़ना कठिन है। अनेक तरह की सहायता करते रहते हैं लोग, जैसे बच्चों को खुले मे पढ़ते देख ळतंदक व्उंगम की आकंक्षा कुमार ने एक भवन में इनहें स्थान दिया, ताकि बरसात में बच्चों को कष्ट ना हो उनकी पढ़ाई जारी रहे। यह सत्य है कि कोई किसी भले काम मे आगे बढ़ता है तो लोग स्वतः आगे आकर सहायता के लिए हाथ बढ़ातें हैं।
हम अलका जी के कार्य शैली को देख कर प्रभावित हुए। उनके स्कूल में बच्चों से मिले, प्रसन्न और आत्मविश्वास से भरे बच्चे अनुशासित और प्रतिभावान। इन बच्चों को देख कर प्रसन्नता हुई और आंखे नम भी हुई। अगर इन बच्चों को कोई नहीं सहेजता तो ये कहां होते?
धन्यवाद अलका जी और आश्रय। आप इन बच्चों का जीवन संवार रहीं हैं इनका भविष्य गढ़ रहीं हैं। समाज को आप जैसे ही लोगों की जरूरत है।
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