आज से 35-40 साल पहले गैंझा का क्या रूप रहा होगा आप कल्पना कीजिए। सोचिए… तब यह एक्सप्रैस की सड़क नही रही होगी। यहां से लेकर सड़क के पार तक खेत रहें होंगे! कहीं हरियाली होगी तो कही बंजर होगा, पता नहीं। ऊबासी वाले दिन और गहरी नीरव रातें। सुबह-सुबह पशु रम्भाते होंगे और घरों से ऊपर ऊठता रसोईं का धुंआ, यानि की दिन शुरू हो चुका। पशुओं का काम, खेत का काम या कुछ और काम, मर्द घर से निकल जाते होंगे। औरतें भी गृहस्ती के काम निपटा कर दिन को खूंटे से बांध जरा सुस्ताती होंग। शाम को मर्द घर लौट आये, फिर वही गहमागहमी। परिवार घर में तो खाना-पीना सबकी व्यवस्था शुरू। और मर्द भी अपनी बैठक बाहर लगा कर हुक्का ताजा कर, अड़ोसी-पड़ोसी से गुफ्तगूं करते होंगे। निरूसंदेह गांव आज की तरह विकसित नहीं होगा तब तक। आय के साधन भी कम होंगे।
अभी पिछले दिनों, चैपाल लगाए कुछ गैंझा निवासियों से बात करनें का अवसर मिला। नाम पूछनें पर मना कर दिया, पहचान नही बताई। अब हुक्का तो नहीं पी रहे थे ये लोग, थोड़े पढे-लिखे लग रहे थे, चाय पी रहे थेय मुझसे भी चाय का अनुरोध किया। मैंने चर्चा की शुरूवात की, जानना चाहा कि आसपास सोसायटीस के आने से आप सबका जीवन कितना बदला। उनके हिसाब से सब कुछ पूर्ववत ही है कहीं कुछ नहीं बदला। चाहें अनेंको नई दुकाने खुल गईं पर उनके लिए कुछ विशेष बदलाव नहीं है। पर सच में ऐसा ही है क्या?
नहीं, सच यह नहीं है! जाने अनजानें ही आसपास विकसित हुई कई सोसायटीस नें गैंझा पर अपना प्रभाव छोड़ा है। हर तरह से, आर्थिक भी और सामाजिक भी। अनेंक दुकानें खुलींय इससे इनके आमदनी में बढ़ोतरी हुई, रोजगार के अवसर भी बढ़े। घरों में काम करनें वालों का भी आश्रय गैंझा ही है, वह भी मूल निवासियों के लिए आय का साधन है। ईसके अतिरिक्त यहां पर सोसायटी में रहनें वालों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए अनेंक
आधुनिक दुकानें भी खुलीं, जो मूल निवासियों के लिए भी अलग अनुभव है। जब वस्तुए आसानी से उपलब्ध हैं तो उनका प्रयोग भी करनें की इच्छा जागृत होती है। इसके अतिरिक्त, स्कूल भी खुलें हैं, डाक्टर-अस्पताल की सुविधाएं भी मिलीं।
जीवन तो बदला है, कई अर्थों में ३ इससे तो इन्कार नहीं किया जा सकता।
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नमस्ते |
बदल गई है यहाँ के गांवों की आबो हवा
बदल गया है लोगों का अपनापन
बदल गया है लोगों का स्वभाव
उजड़ गई है रूखी सुखी खाकर आई चैन की नींद
खो गई है पैसे की आपा धापी में जीवन की शांति
तहस नहस हो गया है सामाजिक ताना बाना
बर्बाद हो गए भरे पूरे हरे भरे खेत खलिहान
भूखे मर रहे हैं भटक रहे हैं मवेशी, कुत्ते |
रसातल कर दिया गया जमीन का पानी |
जहर भर दिया है कूड़े करकट का जमीन की कोख में |
अब पूछो >>>> क्या फर्कपड़ा है शहरीकरण से |